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क्या युवा शक्ति का दुरुपयोग करती हैं भारत की राजनीतिक पार्टियां ?

  

- गुलज़ार हुसैन   (Gulzar Hussain), Mumbai(India), 24 July 2013

भारत में लोकसभा चुनाव 2014 में होने वाले हैं,लेकिन यहां की राजनीतिक पार्टियों ने युवाओं को लुभाने की सारी तैयारियां शुरू कर दी हैं। यहां की राजनीतिक पार्टियां हमेशा से युवा शक्ति पर निर्भर रही हैं, लेकिन इसके बावजूद भारत में बेरोजगारी की समस्या बहुत जटिल है। एक आम राय यह बनती है कि राजनीतिक चालों का सबसे अधिक शिकार युवा पीढ़ी ही होती है,इसलिए देश में बेरोजगारों की संख्या सबसे अधिक है। वाकई,यहां की राजनीतिक पार्टियों ने अपनी राजनीतिक कुप्रयासों से हमेशा युवाओं को अंधेरे में ही रखा है। देश की कई राजनीतिक पार्टियां अपने लाभ के लिए नई पीढ़ी का उपयोग करती हैं,लेकिन सवाल यह पैदा होता है कि क्या इससे युवाओं को फायदा होता है? नौकरी-रोजगार देने के नाम पर राजनीतिक पर्टियां युवाओं को खूब प्रलोभन भी देतीं हैं। इससे पार्टियों को वोट बटोरने में खूब सहायता मिलती है। अब देश में लोकसभा चुनाव नजदीक है,इसलिए यहां की कई छोटी-बड़ी राजनीतिक पार्टियों की नजर नई पीढ़ी पर है।

गौरतलब है कि देश की कई बड़ी और मुख्य समस्याएं युवाओं से ही जुड़ी रहीं हैं। इनमें बेरोजगारी और गरीबी सबसे अधिक उल्लेखनीय हैं। पढ़ाई पूरी करने के बाद लड़के -लड़कियों के सामने कैरियर बनाने की सबसे बड़ी चुनौती होती है। यही समय किसी भी युवक -युवती के लिए जीवन का सबसे निर्णायक मोड़ भी होता है। लेकिन भारत जैसे देश में बेरोजगारी की समस्या इतनी अधिक है कि आसानी से मन मुताबिक रोजगार या कैरियर का चयन बहुत मुश्किल है। गरीबी से जूझते हुए किसी तरह पढ़ाई पूरी करना और उसके बाद पेट भरने के लिए किसी भी तरह की कोई छोटी-मोटी नौकरी ढूंढना ही युवाओं का उद्देश्य हो जाता है। ऐसी स्थिति में युवाओं के सारे सपने भी धीरे -धीरे चकनाचूर होते रहते हैं। यहां यह भी स्पष्ट कर देना उचित है कि किसी न किसी कारण से लड़के -लड़कियां अपने कैरियर के फैसले खुद नहीं ले सकते और यही वह निर्णायक बिंदू है जहां से उनकी सारी समस्याओं को बनाए रखने का षडयंत्र भी शुरू हो जाता है। यहां मैं यह कहना चाहता हूं कि गरीबी और अशिक्षा के किले को तोड़कर जब युवा उस मोड़ पर आ जाते हैं,जहां से उन्हें अपनी मंजिल की ओर बढ़ना होता है,तो उन्हें एक राजनीतिक और कोरपोरेट साजिश के तहत सीमित कर दिया जाता है। राजनीतिक और कोरपोरेट ताकतों का गठजोड़ जो बुर्जुआ समाज बनाना चाहता है, उसमें वह सबसे पहले युवाओं के सपने तोड़कर अपने हिसाब से ढालना चाहता है।

graphic: Emblem of India

 

 

जिस तरह पढ़े लिखे बेरोजगारों की एक बड़ी संख्या का इस्तेमाल राजनीतिक प्रचारकों के रूप में किया जाता है, उसी तरह उन्हें देशी -विदेशी चमकती कंपनियों में काम देने का प्रलोभन भी दिया जाता है। इसे आप युवा शक्ति के दुरुपयोग की संज्ञा दे सकते हैं। बड़ी चालाकी से कोई राजनीतिक पार्टी किसी जगह पर किसी कंपनी को मॉल या उद्योग चलाने का अवसर देती है और वहां के युवाओं को रोजगार के वादे भी करती है। यह सीधे-सीधे 'पॉलिटिक्स ऑफ पिटी' है। युवाओं को रोजगार देने के वादों से पहले क्या युवाओं के सपने जानने जरूरी नहीं हैं। एक क्षेत्र के सभी गरीब युवक किसी जानवरों के समूह की तरह मॉल में किसी भी कार्य के लिए धकेल दिए जाएं ,यह कैसे उचित है? युवाओं के सपनों पर बिल्कुल ध्यान नहीं देना क्या चालाकी नहीं है? वहीं दूसरी तरफ युवाओं को मॉल और मल्टीप्लेक्सों सहित कई अन्य कंपनियों में बहुत कम सैलरी पर रखा जाता है । इससे इनकी शुरुआती स्तर की जरूरत भी पूरी नहीं होती। गौरतलब है कि बिहार,उत्तर प्रदेश जैसे बीमारू राज्यों के अलावा पंजाब,मध्य प्रदेश जैसे कई प्रांतों से बेरोजगार युवाओं का बड़े शहरों -महानगरों की ओर पलायन भी इसी विमर्श का हिस्सा हैं। यह समझने की जरूरत है कि क्यों आखिर गरीब इलाकों से युवाओं को भागना पड़ रहा है? 

इतना सब कुछ होने के बाद भी युवाओं के लिए बेरोजगारी और गरीबी को लेकर कोई राजनीतिक दल अपने चुनाव अभियान की शुरुआत क्यों नहीं करना चाहता है? आप देखिए कि हर राजनीतिक पार्टी अपने प्रचार -प्रसार और अन्य कई कार्यों के लिए युवाओं पर निर्भर है,लेकिन उनकी समस्याएं उसे छू तक नहीं रहीं हैं। आप देखिए कि देश में कई राजनीतिक पार्टियों ने सांप्रदायिक और उकसाऊ मुद्दों को इस बार जितनी तरजीह देनी शुरू कर दी है क्या उतनी तरजीह युवाओं की समस्या को दिया जा रहा है? 

यह बहुत भयावह स्थिति है। इसे साफ तौर से देखा और महसूस किया जा सकता है, लेकिन इस विषय पर सही ढंग से विश्लेषण करने से लोग कतराते हैं। युवाओं की समस्या पर बात करना राजनीतिक आलोचना की प्रचलित धारा का हिस्सा नहीं हैं,लेकिन निस्संदेह यह एक गंभीर मुद्दा है। अगले वर्ष 2014 में होने वाले चुनाव को लेकर एक बार फिर से राजनीतिक पार्टियों में सरगर्मी है। नेताओं ने युवाओं को पार्टी से जोड़ने के लिए नई -नई पहल करनी शुरू कर दी है। वही सब फिर से दोहराया जा रहा है जो पिछले लोकसभा चुनाव में हुआ था। बेरोजगारों को चुनावी रैलियों के दैरान जुटने वाली भीड़ या भीड़ जुटाने वाली मशीन में बदल दिया जाएगा। क्षणिक लुभावने वादों के सहारे बेरोजगारों की भीड़ राजनीतिक पार्टियों के झंडे थामे,नारे लगाते गलियों -मोहल्लों से गुजरेगी। बाद में जब चुनावी माहौल शांत हो जाएगा तो इन थके-हारे हुए युवाओं को पूछने वाला भी कोई नहीं रहेगा। आप ही कहिए यह युवाओं का दुरुपयोग नहीं तो और क्या है?

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