Topics GREEN world Stories & Images about us contact us

myGREENnews.com

Home »  Topics »  politics
Topics
politics
business
society
culture
GREEN World
development
education
communication
environment
health
human rights
UN & NGOs
Stories & Images
people
regional
photo journal

सत्ता संग्राम फिर भी होगा नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी

  Ram Kumar Mishra, Mumbai(India), 20 January 2014

भूमिका - अप्रैल-मई में 'लोकसभा महा संग्राम' के लिए सभी पार्टियों ने चुनावी बिगुल फूंक दिया है। देश का मुख्य विपक्षी दल जहां नरेंद्र मोदी की अगुवाई में महासमर में उतर चुका है, वहीं सत्ता पर आसीन कांग्रेस ने ऐन वक्त पर अपनी रणनीति बदली और उसने पार्टी को ही आगे रखकर चुनावी समर में विरोधी का सामना करने का फैसला लिया है। संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधी ने राहुल गांधी को पार्टी का पीएम उम्मीदवार घोषित करने का फैसला टाल दिया है। ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी कीबैठक से एक दिन पूर्व १७ जनवरी की शाम को सोनिया गांधी ने कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में खुद यह फैसला सुनाया कि 2014 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी पीएम के उम्मीदवार नहीं होंगे, हालाकि राहुल गांधी चुनावी समर का नेतृत्व करेंगे। सोनिया गांधी के इस फैसले ने निश्चित तौर कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को मायूस किया है। देश की एक बड़ी सियासी पार्टी के इस फैसले से फिलहाल इस हफ्ते के सभी मुद्दे बैकफुट में हैं और फ्रंट में यही मुद्दा आ खड़ा हुआ है, जिस पर विमर्श करना ठीक होगा।

जनता के सामने 16वीं लोकसभा का चुनाव एक ऐसा अवसर लेकर आ रहा है, जो उनका, उनकी संतति के भविष्य को बनाने-बिगाड़ने में महति भूमिका अदा करेगा। हालाकि संविधान निर्माताओं के प्रति यह देश ऋणी रहेगा, जिन्होंने इसे यह अधिकार दिया है। हर पांच साल के बाद इस देश का हर नागरिक अपनी मन पसंद की सरकार चुनता है, जो उसके ऊपर शासन करती है। यह सतही स्तर पर कितनी अच्छी शासन प्रणाली है, जहां जनता को यह अधिकार होता है कि उसके ऊपर कौन शासन करेगा इसका फैसला खुद जनता करती है, यही तो है लोकतंत्र। लेकिन अगर जनता को शासक का विकल्प ही नहीं दिया जाए तो? हां, यहां कुछ ऐसा ही है। देश में कुछ एक प्रादेशिक सरकारों को अगर छोड़ दिया जाए तो पूरे देश की राजनीति दो धुरी पर आकर खत्म जाती है, पहली कांग्रेस जो देश में 128 वर्षों से सत्ता या सत्ता के इर्द-गिर्द बनी रही है। दूसरी पार्टी है भारतीय जनता पार्टी जो थोड़ी नई है, लेकिन अब तक इसने भी पूरे देश में अपनी जड़ों को गहराई तक जमाया है। अब, जब-जब भारतीय नागरिक के सामने अपने शासक के चुनने का विकल्प आया है, वो इन्हीं दोनों दलों में से किसी एक को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष चुनने के लिए विवश है। इसी विवशता के दायरे में रहकर ही यह विमर्श भी दोनों दलों के दांव-पेंचों का गणित समझने की एक कोशिश है।

भारतीय जनता पार्टी ने पिछले वर्ष गोवा में हुई पर्टी बैठक में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को अप्रैल-मई में होने वाले आम चुनाव के लिए अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर लंबे अरसे से झेल रही कांग्रेस के इस ताने का जवाब दे दिया कि भाजपा में अब कोई मतभेद नहीं है, और भाजपा में भी अटल बिहारी वाजपेयी के बाद एक केंद्रीय नेतृत्व मिल गया है। एक तरह से देखा जाए तो भाजपा में केंद्रीय नेतृत्व को लेकर समस्या तब भी थी और आज भी है, यह समस्या है, आडवाणी समूह। खैर जो भी हो, लेकिन भाजपा ने मोदी को आगे लाकर कांग्रेस को करारा जवाब दिया और कांग्रेस के तानों से पीछा छूटा। लेकिन कांग्रेस को आड़े हाथ लेते हुए भाजपा ने उसे वंशवादी पार्टी बताकर एक तरह से राहुल को पीएम पद का उम्मीदवार मान बैठी थी, भाजपा आगामी लोकसभा के आम चुनाव को मोदी बनाम राहुल गांधी के रूप में देख रही थी। यही नजरिया आम नगरिकों का भी था। लेकिन कांग्रेस के पास राजनीति का पुराना अनुभव है, वह जीती हुई बाजी को पलटने का दमखम रखती है, यह समय-समय पर उसकी आश्चर्यजनक रणनीतियों से पता चलता है।

पूरा देश जब राहुल गांधी को पीएम पद के उम्मीदवार के रूप में देख रहा था और 17 और 18 जनवरी की क्रमशः कांग्रेस कार्य समिति और अखिल भारतीय कांग्रेस समिति की बैठक को एक औपचारिक क्षण के रूप में देखा जा रहा था, जब राहुल गांधी को पीएम पद का उम्मीदवार कांग्रेस घोषित किया जाता। लेकिन ऐन वक्त पर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का आगे आकर राहुल को पीएम पद के उम्मीदवार बनाए जाने के फैसले को टालने की घोषणा ने पूरे देश के राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया। हलाकि कांग्रेस के इतिहास की जानकारी रखने वालों के लिए यह कोई बड़ी बात नहीं होगी, क्योंकि वे कांग्रेस की नीतियों को भले ही न समझ पाए हों, लेकिन वो इतना तो जरूर जानते हैं कि कांग्रेस राजनीति की बिसात पर कब कौन सा पाशा फेंकेगी, यह कोई अनुमान नहीं लगा सकता। दिन-रात कांग्रेस-कांग्रेस करने वाले खुद कांग्रेसी नेताओं को भी इस बात से अश्चर्य हुआ, जब पार्टी प्रवक्ता जनार्दन द्विवेदी ने सोनिया गांधी के फैसले को देश के सामने रखा। भाजपा को नाजीवादी, फासिस्टवादी, तानाशाही, कट्टर और बहुमत वाली पार्टी बताने वाली कांग्रेस का यह फैसला कांग्रेस में किस तरह फैसले लिए जाते हैं, कांग्रेस में पार्टी के नेताओं की कितनी बात सुनी जाती है, उनकी बातों को कितनी अहमियत मिलती है, क्या इसका जवाब कांग्रेस कम से कम ऐसे फैसले के बाद देगी?, जबकि पूरे कांग्रेसी नेता, यहां तक कि शीर्ष और पुराने कांग्रेसी नेताओं को भी अपनी इच्छा के खिलाफ जाकर पार्टी अध्यक्ष के फैसले के आगे नतमस्तक होना पड़ा।

पार्टी के इस फैसले के बाद आखिर कांग्रेस से यह सवाल क्यों ने पूछा जाए कि भाजपा में मोदी को दबंग नेता बताने वाली कांग्रेस अपनी ही पार्टी की दबंग नेता के आगे क्यों घुटने टेक देती है? तब कांग्रेस में इस प्रवृत्ति को पार्टी का अनुशासन कहा जाता है और जब यह प्रवृति विरोधी दल में हो तो उसे फांसीवादी और नाजीवाद की संज्ञा देना कहां तक उचित होगा? कांग्रेस अध्यक्ष के आगे कांग्रेसी नेताओं की कितनी चलती है, इसका नमूना देखने के लिए द्गयादा पुरानी बात टटोलने की जरूरत नहीं, चंद रोज पहले एक हिंदी समाचार पत्र को दिए साक्षत्कार में राहुल गांधी ने इस बात को स्वीकार किया था कि वह पार्टी द्वारा दी गई सभी जिम्मेदारियों को निभाने के लिए तैयार हैं। राहुल गांधी ने अपने साक्षात्कर में कहा था, ''मैं कांग्रेस का सिपाही हूं, मुझे जो भी आदेश दिया जाएगा, मैं उसका पालन करूंगा, कांग्रेस जो भी कहेगी मैं उसे करने के लिए तैयार हूं।'' यहां वह आगे जो बात कहते हैं वह कांग्रेस की कार्य समिति में लिए गए फैसले के बाद कितना हास्यस्पद लगता है, इसका सीधा उदाहरण देखा जा सकता है। राहुल गांधी अपने सक्षात्कार में कहते हैं, ''हमारी पार्टी में फैसले वरिष्ठ नेताओं द्वारा लिए जाते हैं।

BJP Prime Ministerial Candidate for General Election- 2014 of India and Gujarat Chief Minister Narendra Modi during his Mumbai visit. photo: Hamara Mahanagar (Mumbai)

पहले भी कुछ फैसले लिए गए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं जिम्मेदारी संभालने का इच्छुक नहीं हूं। मेरी जिंदगी में हठधर्मिता का कोई शब्द नहीं है, कांग्रेस ने जो भी मुझसे चाहा मैंने किया।'' राहुल गांधी के इस बयान से कई सवाल जन्म लेते हैं। पहला सवाल ये कि अगर आप सभी जिम्मेदारियों को संभालने के इच्छुक हैं तो पार्टी के उपाध्यक्ष रहकर भी आपकी इच्छाओं का सम्मान क्यों नहीं किया गया? दूसरा सवाल यह उठता है कि आप यह कहते हैं कांग्रेस में सभी फैसला वरिष्ठ नेताओं द्वारा लिया जाता है, फिर कपिल सिब्बल, पी चिदंबरम, सलमान खुर्शीद, मनीष तिवारी, अंबिका सोनी, ऑस्कर फर्नांडीज, सचिन पायलट, मणिशंकर अय्यर और राहुल गांधी को पीएम के रूप में देखने का सपना लिए एक अरसे से घूम रहे दिग्विजय सिंह जैसे दिग्गज पार्टी नेताओं की इच्छाओं का यह कैसा सम्मान है कि उनकी इच्छाओं को दरकिनार कर पार्टी अक्ष्यक्ष आगे आकर अपना फैसला सब के फैसलों के खिलाफ सुना दिया?

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के फैसले ने निश्चित रूप से एक बार फिर से राजनीतिक पंडितों को चक्कर में डाल दिया। अब प्रश्न यह उठ रहा है कि पार्टी के खिलाफ सोनिया गांधी ने यह फैसला क्यों लिया है? इस समय राजनीति के चतुर पंडित 2004 की याद कर रहे हैं। उस वक्त भी भाजपा के 'इंडिया शाइनिंग' में पूरा देश चौंधिया गया था, लेकिन उसके खिलाफ 'कांग्रेस के हाथ को, आम आदमी के साथ' मिल गया था, जिससे वह अश्चर्यजनक जीत हासिल की थी। उस समय संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) को मिले कुल 275 सीटों में कांग्रेस को 145 सीटों पर कब्जा मिला था, जबकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को मिले कुल 185 सीटों में से भाजपा ने 138 सीटों पर कब्जा किया था। 2004 में भी कांग्रेस बिना किसी पीएम उम्मीदवार के ही चुनाव मैदान में उतरी थी। हालाकि यह सरकार डॉ मनमोहन सिंह के नेतृत्व में सत्ता में रही और आम आदमी ने कांग्रेस के हाथ की मजबूती को इन पांच सालों में आजमाया, शासन की संतोषजनक स्थिति और भाजपा के अंतर्कलह से जनता ने एक बार फिर 2009 के लोकसभा चुनाव में राजग के 158 सीटों के मुकाबले यूपीए को 261 सीटों को देकर उसे सत्ता तक दुबारा पहुंचाया। लेकिन इस बार क्या हुआ? यूपीए ने जमकर लूटपाट की। घोटाले के बाद घोटाले होने लगे। अरबों-खरबों रुपए देश के सफेदपोश चेहरों ने लूटकर देश की अर्थ व्यवस्था को अपाहिज बना दिया। आम आदमी महंगाई के बोझ में दबकर दम तोड़ने लगी, जबकि नेता और अफसर मिलकर निजी कंपनियों को खुली छूट दे दी के वे अपने मन माफिक मुनाफे के लिए तेल और खनिज के दाम तय करें। देश में विदेशी कंपनियों के लिए दरवाजे खोल दिए। इस देश के छोटे व्यापारियों, फुटपाथ और रेहड़ी पर अपनी आजीविका चलाने वाले लाखों व्यापारियों की आंखों के सामने एफडीआई का भूत खूनी पंजे लिए लपकने लगा। देश की 60 फीसद आबादी जो गांवों में निवास करती है, को मात्र 27.1 रुपए की अमदनी जुटाने पर उसे अमीर बताकर उसका भद्दा मजाक बनाने वाली संप्रग सरकार ने देश की करोड़ों गरीब जनता के साथ विश्वासघात किया। देश कांग्रेस के इस विचारधारा को देखकर हतप्रभ था, उसने आगामी लोकसभा चुनाव के पहले हुए पांच राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव में अपने इरादों का संकेत दे दिया है, जिसका नजारा देख अब कांग्रेस हतप्रभ है, हताश है। क्या यह उसी हताशा, निराशा का परिणाम है कि एक लंबे अरसे से राहुल को पीएम पद की उम्मीदवारी देने का सपना देख रही सोनिया गांधी अब खुद इस बात के लिए अपना कदम पीछे खींच रही हैं?

पिछले वर्ष जयपुर में हुए कांग्रेस के चिंतन शिविर में राहुल गांधी ने मंच पर खड़े होकर पूरे देश के सामने अपनी मां सोनिया गांधी से हुई बातचीत और उनकी अत्मीय इच्छा को प्रकट किया था। राहुल गांधी के अनुसार उनकी मां ने कहा था,'' सत्ता एक जहर है, जिसके पीछे लोग भागते हैं।'' राहुल गांधी ने आगे कहा,'' उन्होंने अपनी दादी और पिता को खोया है। 'वो' उन्हें भी मार देंगे। '' राहुल के इस बयान के बाद कांग्रेसी खेमे में यह आशंका दौड़ पड़ी थी कि क्या सोनिया गांधी राहुल गांधी को सत्ता का जहर पीने से रोक रही हैं? क्या सोनिया गांधी स्वयं नहीं चाहतीं कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनें, लेकिन बाद में ऐस क्या हुआ कि सोनिया गांधी ने स्वयं कहा कि कांग्रेस चुनाव से पहले उचित समय आने पर अपने पीएम पद का उम्मीदवार घोषित करेगी, जिसके बाद फिर से राहुल गांधी को लेकर बहस छिड़ गई थी कि कुछ ही दिनों में कांग्रेस औपारिक रूप से राहुल को अपने पीएम पद का उम्मीदवार घोषित करेगी। इन सभी अटकलों को पीछे छोड़ते हुए सोनिया गांधी ने जो फैसला सुना दिया है, वही सर्वमान्य है।

अब कांग्रेस पार्टी चुनावी समर में बिना किसी पीएम उम्मीदवार के ही राहुल गांधी के नेतृत्व में चुनाव लड़ने जा रही है। लेकिन तब पर भी यह लड़ाई मोदी बनाम राहुल गांधी ही होगी। अगर कांग्रेस रक्षात्मक बयान में यह कहती है कि कांग्रेस अपनी परंपरा के अनुसार चुनाव के बाद पीएम पद का चयन करती है तो वह 1947, 1966, 1984, 2009 के चुनाव को भूल रही है, जब पीएम पद के घोषित उम्मीदवार थे।

politics »
Anne Jung, medico international
Ein Alptraum im Wachzustand
Angola zwischen Krieg und Frieden: Alptraum ohne Ende?
한국 여당, 아시아 국회 정당연대 추진
끝없는 국가 이기주의로 인한 유럽공동체의 위기
Bush peace flag
Die zwei geteilte Stadt Mainz
둘로 갈라진 도시 마인츠
top TOP
imprint | disclaimer