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क्या भारतीय राजनीति में हो सकता है बड़ा बदलाव ?

  - गुलज़ार हुसैन   (Gulzar Hussain), Mumbai(India), 23 June, 2013

पिछले दिनों भारतीय राजनीति में ऐसा कुछ हुआ है,जिससे यह आशा जग उठी है कि क्या भारतीय राजनीति में बड़ा बदलाव हो सकता है? इधर भारतीय राजनीति में दो महत्वपूर्ण बातें हुईं हैं। एक तो सांप्रदायिक राजनीति का बडे़ स्तर पर अस्वीकार हुआ है और दूसरा युवा पीढ़ी को लेकर नेताओं ने अपने में बदलाव लाना शुरू किया है। दरअसल भारतीय राजनीति से सांप्रदायिकता का सूरज अस्त होना और नई पीढ़ी के वैज्ञानिक दृष्टिकोण का उदय होना ही सियासी दुनिया में बड़े बदलाव के संकेत हैं।

गौरतलब है कि भारतीय राजनीति में सांप्रदायिकता सबसे पुराना रोग रहा है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत -पाक बंटवारे के समय यह रोग बहुत मुखर हो गया। लेकिन इससे पहले भी यह रोग अमूर्त रूप में भारतीय राजनीति में मोड़ लाने वाला कहलाता रहा है। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि भारतीय राजनीति में केवल सांप्रदायिकता का रोग ही तूफान लाता रहा है,क्योंकि अन्य कई रोगों ने सियासत को अक्सर महत्वहीन बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। सांप्रदायिकता के अलावा प्रांतवाद,जातिवाद,भाषावाद सहित कई ऐसे गंभीर रोगों ने समय-समय पर भारतीय राजनीति को प्रभावित किया है और इसके कई दुष्परिणाम भी लोगों को भुगतने पड़े हैं।

Sansad Bhavan, parliament building of India. photo: David Castor
पिछले कई वर्षों से भारत की दक्षिणपंथी और प्रमुख विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को आगे बढ़ाने का खूब प्रयास किया है। इसको लेकर भाजपा और उसके सहयोगी दलों में खूब गुटबाजी होती रही है। पार्टी और उसकी सहयोगी पार्टियों में कई बार मोदी के विरोध में आवाजें उठती रहीं हैं। यह तो सर्वविदित है कि मोदी को पार्टी का कट्टरवादी और सांप्रदायिक चेहरा माना जाता रहा है। गुजरात दंगों को लेकर मोदी पर गंभीर आरोप लगते रहे हैं। इन सबके बावजूद भाजपा ने मोदी को लगातार आगे करके एक अलग तरह की  राजनीति करने का प्रयास किया। अगले वर्ष होनेवाले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर ही इस तरह के प्रयास भाजपा की ओर से हुए। लेकिन अब भाजपा में इसे लेकर भूचाल उठ खड़ा हुआ। अब तक मोदी को लेकर जो विरोध हो रहा था वह उतना मुखर नहीं था। लेकिन अब भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ही नाराज हो गए। उनके साथ कई वरिष्ठ नेता मोदी के नाम पर बिफर गए। दरअसल भाजपा की ओर से मोदी को अगले चुनाव की कमान सौंपने का सीधा मतलब था,मोदी को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में खड़ा करना। इससे आडवाणी आहत हुए। आडवाणी पर भी रथ यात्रा करके बाबरी मस्जिद विध्वंस की जमीन तैयार करने के आरोप लगते रहे हैं। तो बात यह हो गई कि एक वरिष्ठ दिग्गज उभरते दिग्गज से पिछड़ने लगा। ऐसी तमाम अटकलों के बाद आडवाणी ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। भाजपा पूरी तरह हिल गई ।

हालांकि बाद में उन्होंने इस्तीफा वापस ले लिया। लेकिन सवाल वहीं का वहीं टंगा रह गया। इसके बाद बिहार में भाजपा की सहयोगी पार्टी जदयू ने मोदी के नाम पर नाराजगी जाहिर की और गठबंधन तोड़ लिया। इसके बावजूद जदयू से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने विश्वास मत हासिल करने में सफलता पाई। नीतीश कुमार और कई अन्य राजनीतिज्ञों के मोदी के विरोध का सीधा और स्पष्ट कारण रहा है। उन्होंने मोदी के विरोध के बहाने सांप्रदायिकता की राजनीति से अपना पीछा छुड़ाया है। कोई इसे अगर अवसरवाद कहता है तो यह सांप्रदायिकता की राजनीति से पीछा छुड़ाने का सकारात्मक अवसरवाद भी है। सांप्रदायिकता की सियासी छवि से मुक्त होने का प्रयास स्वयं मोदी ने खूब किया है। उन्होंने पिछले वर्ष कई सद्भावना और एकता कार्यक्रम के आयोजन किए। तो मूल तथ्य यह है कि लोग सांप्रदायिकता की राजनीति से छुटकारा पाना चाहते हैं, क्योंकि नई पीढ़ी की बड़ी संख्या ने इसे अस्वीकार कर दिया है।

नई पीढ़ी के गुस्से से सभी पार्टियां वाकिफ हैं। पिछले कुछ वर्षों में भ्रष्टाचार के सबसे अधिक आरोप केंद्र की सत्ता पर काबिज कांग्रेस पार्टी पर लगते रहे हैं, इसलिए अन्य पार्टियों के साथ कांग्रेस भी युवा पीढ़ी के हिसाब से खुद को ढालने में लगी है। युवाओं ने अण्णा हजारे के आंदोलन के समय भ्रष्टाचार के खिलाफ अपना आक्रोश दिखा ही दिया था। इसलिए इसको लेकर भी भारत की राजनीतिक पार्टियां खुद को युवा पीढ़ी के वैज्ञानिक दृष्टिकोणों के अनुसार अपने एजेंडे बनाने में लगी है। बहरहाल, इधर की राजनीतिक परिस्थतियां यह बता रहीं  हैं कि भारतीय राजनीति में कुछ बड़े बदलाव हो सकते हैं।

 

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