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आशा के दीप कैलाश और मलाला

  Ram Kumar Mishra, Mumbai(India), 27 December 2014

एक लंबे अंतराल के बाद आज फिर हम आपसे रू-ब-रू हो रहे हैं। इस दौरान गंगा-यमुना में बहुत पानी बह चुका है। भारत में कई ऐसी छोटी-बड़ी घटनाओं का चक्र चलता रहा, जो कभी देश तो कभी विदेशों तक में इनकी धमक सुनाई पड़ी।  

आज इस आलेख में जिक्र करने के लिए हिंदुस्तान की जमीन पर कई ऐसे किस्से बने भी और बिगड़े भी, जिसमें कुछ तो देश का गौरव  बढ़ाते हैं और कुछ शर्मसार भी कर जाते हैं। लेकिन कहते हैं कि अंत भला तो सब भला। पूरे वर्ष की घटनाओं का गुणा-भाग करने के बाद थोड़ा संतोष होता है कि जिस तरह से पश्चिम एशिया और इसके पडोसी देशों की हालत है उससे तो स्थिति भारत की अपेक्षाकृत बेहतर है। हाँ, अंदरूनी हालात कुछ ऊबड़-खाबड़ जरूर हैं, लेकिन हमें यह भी याद रखना होगा कि हमें राम राज्य की आस भी नहीं रखनी चाहिए।साल के अंत में नार्वे की राजधानी ओस्लो में आयोजित शांति के नोबेल पुरस्कार समारोह में नोबेल पुरस्कार पाने वाले दो महान शख्सियत पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई और भारत के कैलाश सत्यार्थी के शानदार भाषण उक्त अन्य सभी अच्छी-बुरी घटनाओं पर भारी पड़े, हर तरह से हर लिहाज से, सो इसी विषय के साथ इस वर्ष के अंतिम आलेख के साथ आपके बीच हूं। 

पाकिस्तान की मलाला यूसुफजई और भारत के कैलाश सत्यार्थी ने नोबल पुरस्कार समारोह में ऐसा कुछ कहा कि सभागार में होने वाली तालियों की गड़गड़ाहट ने पाकिस्तान और हिंदुस्तान की सीमाओं को छू लिया। देश में हिंदू-मुसलमान धर्म को लेकर लड़ रहे थे, वहीं इसी समय तीसरी दुनिया में इन दोनों देशों के नुमाइंदे एक अलग ही धर्म के लिए सम्मानित किए जा रहे थे, और धर्म था मानवता का धर्म, ज्ञान का धर्म, विकास का धर्म, सहिष्णुता का धर्म, मुक्ति का धर्म। 

इस मौके पर पूरे हिंदुस्तानी लिबाज में कैलाश सत्यार्थी हॉलीवुड के स्टूडियो की तरह सजाए गए मंच पर जब पहुंचे तो उनकी शादगी बेमिसाल थी। उन्होंने भाषण हिंदी से शुरू किया। बेशक अगर यह किसी राजनेता ने ऐसा किया होता तो यह हिंदुस्तान की मीडिया के लिए एक विशेष बात होती, लेकिन यहां पर कैलाश सत्यार्थी थे। वैसे भी हम किसी विदेशी दौरे पर अपने किसी नेता को इधर-उधर हिंदी बोलते हुए सुनकर भावुक हो जाते हैं, लेकिन कैलाश सत्यार्थी की हिंदी बेजोड़ थी। लेकिन यह कमाल उस हिंदी का नहीं, उस मकसद का था जिसे एक लंबे संघर्ष के बाद कैलाश सत्यार्थी ने हासिल किया था। 

कैलाश सत्यार्थी ने अपनी वैश्विक और ऐतिहासिक उपलब्धि को अपने उन सिपाहियों को समर्पित किया जो उनके इस संघर्ष यात्रा में कुर्बान हो गए। मंच से कैलाश ने अपने साथियों का स्मरण करते हुए कहा- ''मैं अपने इस सम्मान का सबसे बड़ा श्रेय भारत के कालू कुमार, धूमदास, आदर्श किशोर और पाकिस्तान के बालक इकबाल मसीह को देना चाहूंगा, जिन्होंने बच्चों की आजादी और गरिमा के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया। मैं यह पुरस्कार सभी शहीदों की ओर से, विश्व भर में बचपन को बचाने में जुटे कार्यकर्ताओं की ओर से, और मेरे समस्त देशवासी भाई-बहनों की ओर से स्वीकार
करता हूं।''

The Nobel Peace Prize Ceremony 2014 in Oslo - Malala & Kailash
The Nobel Peace Prize Ceremony 2014 in Oslo. photo: youtube/nobelprize.org

कैलाश सत्यार्थी ने अपनी यात्रा का मकसद जो बयान किया वह पूरे विश्व-बंधुत्व की भावना का आईना था, साथ ही भारत के विशाल हृदय का परिचायक भी, '' भगवान बुद्ध, गुरु नानक और महात्मा गांधी की धरती भारत से नार्वे तक की मेरी यह यात्रा धरती पर शांति और विश्व बंधुत्व की प्राचीनतम और वर्तमान धुरियों को जोड़ने वाली यात्रा है'' बच्चों के अधिकारों और उनकी मुक्ति के लिए आजीवन संघर्षरत कैलाश सत्यार्थी ने अपने जीवन का लक्ष्य भी दुनिया को बता दिया और यह भी बताया कि यह लड़ाई अकेले कैलाश सत्यार्थी की नहीं है, बच्चों के अधिकारों और उनके आजाद बचपन के लिए दुनिया के हर कोने में संघर्ष करने के लिए हमें तैयार होना चाहिए। क्योंकि आज बचपन देश के हर शहर, हर गांव में कहीं न कहीं झुलसता हुआ दिखाई पड़ जाएगा। उसकी रक्षा में खड़ा होना पड़ेगा। कैलाश सत्यार्थी ने सभी धर्मों का हवाला दिया और बताया कि दुनिया के हर धर्म बचपन को स्वतंत्र और उन्मुक्त वातावरण के हिमायती हैं। उन्होंने कहा कि मैं ऐसे मंदिर, मस्जिद, चर्च और पूजा स्थलों को अस्वीकार करता हूं जो बच्चों को सपने देखने से रोकते हैं। मैं ऐसे समस्त कानूनों, न्यायाधीशों को अस्वीकार करता हूं, जो बच्चों के अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकते। मैं इस बात को भी अस्वीकार करता हूं कि दासता की जंजीरें इतनी मजबूत हैं कि वह आजादी की महत्वाकांक्षा को कैद कर सके।

कैलाश सत्यार्थी ने अपने भाषण में दुनिया को आगाह करते हुए कहा कि दुनिया इस समय असहिष्णुता के दरवाजे पर खड़ी है, यह मानवता के लिए सबसे बड़ा खतरा है। कैलाश सत्यार्थी ने पाकिस्तान की एक पश्तून लड़की मलाला यूसुफजई के कार्यों की प्रशंसा की जो पाकिस्तान में लड़कियों की शिक्षा के लिए लगातार संघर्ष कर रही है। मलाला की इस संघर्ष यात्रा में उसे वर्ष २०१२ में चरमपंथी गुट ने अपनी गोली का निशाना बनाया, मलाला के सिर पर गोली मारी गई, लेकिन पाकिस्तान की लाखों दबी-कुचली लड़कियों को मलाला की जीवंत प्रेरणा मिलना ईश्वर को अभी मंजूर था और उसने अमानवीयता पर विजय पाई और साथ ही अपनी मृत्यु पर भी। अपने भाषण में कैलाश सत्यार्थी ने कहा कि मलाला जैसे बच्चे हर जगह खड़े हो रहे हैं और हिंसा पर शांति, कट्टरता पर सहिष्णुता और भय पर साहस को चुन रहे हैं।

सवाल बनता है कि क्या यह लड़ाई अकेले भी लड़ी जा सकती है? जबकि १८ साल पहले लाखों लोगों की १०३ देशों में ८०,००० किलोमीटर की पद यात्रा के बाद अंतर्राष्ट्रीय बाल श्रम कानून अस्तित्व में आया था। जवाब में कैलाश सत्यार्थी ने कहा कि हम और आप तेजी से वैश्वीकरण की ओर बढ़ते हुए युग में जी रहे हैं। हम हाई स्पीड इंटरनेट से जुड़े हुए हैं। हम सामानों और सेवाओं का आदान-प्रदान करते हैं। एयर लाइंस से हम प्रतिदिन दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने में पहुंच रहे हैं। बावजूद इसके, बच्चों के अधिकारों को लेकर एक खाई बनी हुई है, हम एक नहीं हो पा रहे हैं। इस पूरे भाषण के दौरान कैलाश सत्यार्थी के चेहरे पर एक अजीब सा संतोष दिखाई दे रहा था। उन्होंने कहा भी, '' मैं उन हजारों बच्चों का स्मरण करता हूं जिन्हें आजाद कराते समय मैं स्वयं मुक्त होता हूं। मुक्ति की पहली मुस्कान भरे उन सुंदर चेहरे को देखकर मैं बार-बार ईश्वर को मुस्कुराते हुए देखता हूं।''

कैलाश सत्यार्थी इस दौरान मलाला को अपने रिश्तों में जोड़ते हुए उसे बेटी संबोधित करते हैं। यह भी देखने योग्य था कि भारत और पकिस्तान शांति के लिए अंतर्राष्ट्रीय मंच पर सम्मानित किए जा रहे थे, जो बिलकुल राजनीतिक छाया से दूर विशुद्ध हृदय से किए गए कार्यों के लिए था। जिस तरह से कैलाश ने अपना भाषण विश्व कल्याण के लिए वर्णित वेद मंत्र से शुरू किया उसी तरह से मलाला ने अपने भाषण की शुरुआत में पवित्र कुरान में वर्णित शांति के वचनों- ''बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम'' से किया और कहा ''एक बच्चा, एक शिक्षक, एक कलम और एक किताब दुनिया को बदल सकता है। '' कैलाश सत्यार्थी जैसी उच्च शख्सियत के साथ शांति का नोबल पाकर मलाला खुद को गौरवान्वित महसूस कर रही थी। 

ओस्लो के इस वैश्विक समारोह में मलाला ने कहा, '' मैं कैलाश सत्यार्थी के साथ यह पुरस्कार लेते हुए गर्व महसूस कर रही हूं, जो लंबे समय से बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए चैंपियन रहे हैं। मुझे इसलिए भी गर्व महसूस हो रहा है कि हमने दुनिया को यह दिखा दिया है कि भारत और पाकिस्तान शांति और बच्चों के अधिकारों के लिए एक साथ खड़े हो सकते हैं।'' यह भरोसा तो कोई बच्चा ही जाहिर कर सकता है, सयाने तो सियासत को ही नसीब मान बैठे हैं। मलाला ने अपने नाम का अर्थ और नामकरण की कहानी भी बताई। मलाला का अर्थ होता है दुख, निराशा। लेकिन आज मलाला विश्व में उम्मीद की किरण के रूप में देखी जा रही है। उदासी नाम वाली इस लड़की ने अरबों लोगों को आज गुदगुदा दिया, जोश से भर दिया। १७ साल की यह लड़की कई बार अपनी ऊंची आवाज से ऐसी तासीर पैदा कर रही थी, जैसे वह सोए हुए लोगों को जगा रही हो। जिस देश की धरती पर आतंकवाद पनप कर पूरी दुनिया में दहशगर्दी की शाखाएं खोल रहा हो, मलाला उसी देश की होकर उनकी बंदूकों के सामने खड़ी होकर उन्हें, उनके नापाक इरादों को चुनौती दे रही थी। उत्तरी पाकिस्तान में भय और आतंक में बर्बाद हुए श्वात घाटी की पश्तून जाति में जन्मी, पली-बढ़ी मलाला ने शिक्षा के महत्व को जिस तरीके परिभाषित किया, शायद यह दुनिया के महान शिक्षाविदों की परिभाषाओं से परे हो। 

मलाला ने कहा, ''शिक्षा जीवन के विभिन्न वरदान में से एक है, और इसकी आवश्यकता भी। यह मेरी १७ साल की जिंदगी का अनुभव है। मैंने हमेशा शिक्षा को चाहा और नई चीजें सीखीं। मुझे याद है जब मैं और मेरी सहेलियां अपने हाथों में हिना (मेंहदी) रचती थीं, उस समय हम अपने हाथों में फूल-पत्तियों और डिजाइनें नहीं, बल्कि गणित के सूत्र और गणितीय चिन्हों को उकेरते थे। मलाला ने अपना कद अपनी रचना खुद की भौतिक रचना से काफी ऊंचा और विस्तृत बताया जो अक्षरशः सत्य है। मलाला ने कहा,'' यद्यपि मैं एक लड़की दिखती हूं, एक इंसान, जो पांच फुट दो इंच लंबी है। लेकिन मैं अकेली आवाज नहीं हूं। मैं अपने जैसी कइयों में से एक हूं। मैं शाजिया हूं। मैं कायनात रियाज हूं। मैं कायनात सोमरो हूं। मैं मेजोन हूं। मैं अमीना हूं। मैं उन ६६० लाख लड़कियों में से एक हूं जो आज भी शिक्षा से वंचित हैं। 

मलाला ने इस मंच पाकिस्तान सहित दुनिया के तमाम मुस्लिम देशों में चरमपंथी विचारधारा के प्रभाव में लड़कियों की शिक्षा और स्वतंत्र जीने की चाह का कत्ल किए जाने की दर्दनाक और हिला देने वाली दास्तान पर रोशनी डाली। मलाला अपने दौर के तमाम हिंसा को याद कर रही थी। उसने कहा कि यह साल प्रथम विश्व युद्ध के सौ साल पूरा होने का भी है। लेकिन आज भी हमने युद्ध से सबक नहीं सीखा है। आज भी दुनिया के कई मुल्कों में युद्ध जैसे हालात हैं। इराक, सीरिया, इस्त्राइल, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, और अफ्रीका के कई देश बुरे हालात से जूझ रहे हैं। यहां शांति नहीं है। कैलाश सत्यार्थी और मलाला के भाषण बेहद प्रभावशाली थे। यह पहली बार था, जब एक ही मंच पर भारत और पाकिस्तान दोनों सम्मानित महसूस कर रहे थे। वरना एक के सम्मान पर दूसरे का दिल ही जलता है। वास्तव में निराशा के चतुर्दिक झंझावात में कैलाश और मलाला आशा के झिलमिलाते हुए दीप हैं।

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