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क्या भारत में बदल रहा है स्त्रियों का जीवन ?

बलात्कार की घटनाओं के खिलाफ युवा पीढ़ी में आक्रोश

गुलजार हुसैन (Gulzar Hussain) , Mumbai(India), 08 March 2014

भारत जैसे घोर पुरुषवादी देश में स्त्रियों का जीवन बेहद कठिनाइयों से भरा होता है,लेकिन पिछले दो -तीन वर्षों में स्त्री -अधिकारों को लेकर नई पीढ़ी में नई चेतना का विकास हुआ है। विशेष रूप से स्त्रियों के खिलाफ होने वाले अपराधों को रोकने को लेकर नई पीढ़ी में एक जागरुकता आई है। वर्ष 2012 के दिसंबर महीने में दिल्ली में हुई सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद उपजे आक्रोश को इस विषय में एक बड़ा टर्निंग प्वाइंट माना जा सकता है। इसके बाद जागरुक युवा पीढ़ी ने देश में एक सकारात्मक माहौल बनाने की राह प्रशस्त की है। आंदोलनों और अन्य संचार माध्यमों की पहल के सहारे देश में एक नई स्त्रीवादी क्रांति की शुरूआत हुई है। निस्संदेह,कांटों भरी राह पर चलती स्त्रियों के जीवन में उत्साह और आशा का संचार हुआ है। गौरतलब है कि यहां छेड़खानी,यौन शोषण,सामूहिक बलात्कार,दहेज प्रताड़ना और स्त्री भ्रूण हत्या  

photo: Gulzar Hussain

 

 

जैसी कई गंभीर समस्याओं के साए में औरतें अपना जीवन गुजारती हैं। पुरुषवादी वर्चस्व वाले समाज में इतने सारे संकटों के बावजूद स्त्रियां अपनी राह तलाशती हैं। भारत में बलात्कार और सामूहिक बलात्कार या अन्य यौन अपराधों के कारण स्त्रियों का जीवन बहुत संकटग्रस्त हो जाता है। इस पुरुष प्रधान समाज में औरतों को जन्म लेने से पहले और आखिरी सांस तक प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है। स्त्री भ्रूण हत्या जैसे अपराध के कारण लड़कियां जन्म लेने से पहले ही गर्भ में दम तोड़ देती हैं। पुरुष प्रधान समाज में यदि लड़की का जन्म हो भी जाता है, तो बचपन से ही उसे पुरुषवादी -धार्मिकता की घुटन और संकीर्ण माहौल में जीवन गुजारना होता है। लड़कियों को बचपन में ही बता दिया जाता है कि उन्हें कितना और क्या पढ़ना है,कैसे कपड़े पहनने हैं,किसी के सामने कैसे पेश आना है और किससे बात नहीं करनी है। इसके बाद उच्च शिक्षा,कैरियर और शादी को लेकर लड़कियों को बार-बार तोड़ा जाता है। लड़कियों को शादी से पहले और उसके बाद भी दहेज को लेकर भयंकर तनाव और अत्याचार का सामना करना पड़ता है। इतने सारे संकटों को पार कर आगे बढ़ने का प्रयास करती किसी लड़की या महिला के जीवन में तूफान जब आता है जब वह बलात्कार या यौन शोषण का शिकार हो जाती है। स्त्रियों के खिलाफ होने वाले अपराधों में बलात्कार और सामूहिक बलात्कार सबसे अधिक क्रूरतम अपराध होता है। जैसा कि मैंने पहले ही उल्लेख किया है कि 2012 के दिसंबर में हुए सामूहिक बलात्कार की घटना

के बाद देश भर में व्यवस्था के खिलाफ गुस्सा फूट पड़ा । यह गुस्सा ही देश में एक नई चेतना फैलाने में काफी कारगर रहा। दिल्ली में एक 23 वर्षीय इंटर्न डॉक्टर के साथ सामूहिक बलात्कार की इस घटना ने देश को झकझोर के रख दिया। इस घटना को लेकर देश में व्यापक प्रभाव पड़े। मीडिया के हर क्षेत्र में एक सकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित होने लगी। अखबारों और न्यूज चैनलों पर युवा पीढ़ी की नाराजगी दिखाई देने लगी। लेखों,कार्टूनों और विशेष स्टोरियों के जरिए स्त्रियों के सुरक्षा अधिकारों पर जम कर चर्चा होने लगी। सोशल मीडिया में भी जागरूक और प्रगतिशील युवा पीढ़ी ने व्यवस्था के खिलाफ जमकर आक्रोश व्यक्त किया। इस घटना के बाद बलात्कार को लेकर सख्त कानून बनाने की मांग भी उठने लगी। अखिरकार 2013 में एंटी रेप बिल पास हुआ। क्रिमिनल लॉ(एमेंडमेंट ) एक्ट ,2013 के तहत रेप करने के दोषियों को आजीवन कारावास या मृत्युदंड मिल सकता है। इसके अलावा एसिड अटैक,पीछा करने और ताकझांक करने पर भी कड़ी सजा का प्रावधान है। अब 2014 में भारत की यूनियन हेल्थ मिनिस्टरी ने बलात्कार पीड़ितों की जांच के लिए नई गाइडलाइन बनाई है। इसके अनुसार अब देश के सभी अस्पतालों को बलात्कार पीड़िताओं की जांच के लिए अलग से कमरे बनाने पड़ेंगे। इसके तहत अब टू फिंगर टेस्ट को भी गैरजरूरी करार दिया गया है।

गौरतलब है कि टीवी कार्यक्रम सत्यमेव जयते -2 की पहली कड़ी में आमिर खान ने बलात्कार पीड़िताओं की समस्या को उठाया। इस कार्यक्रम में दिखाया गया कि किस तरह बलात्कार के बाद एक औरत को विभिन्न स्तरों पर प्रताड़ित होना पड़ता है। रेप के बाद पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराने में सबसे पहले समस्या सामने आती है। कई पुलिसवाले एफआईआर दर्ज नहीं करते हैं। कार्यक्रम में दिखाया गया कि मेडिकल की जांच प्रक्रिया भी बहुत कष्टप्रद होती है। सत्यमेव जयते में पीड़िता के साथ होने वाले टू -फिंगर टेस्ट के कारण होने वाले तकलीफ को भी दिखाया गया। हांलाकि देश के स्वास्थ्य मंत्रालय की नई गाइडलाइन के बाद अब आशा जताई जा रही है कि रेप विक्टिम की जांच ऐसे अमानवीय तरीके नहीं होगी। इसके अलावा भी समाज में पड़ोसियों और रिश्तेदारों के ताने भी रेप पीड़िता को सहने पड़ते हैं। इस समस्या को भी सत्यमेव जयते में दिखाया गया। बहरहाल, यह कहा जा सकता है कि टेलिविजन,साहित्य और प्रिंट मीडिया में स्त्री की सुरक्षा और उसके अधिकारों को लेकर नई ऊर्जा का संचार हुआ है। यह ऊर्जा और उत्साह स्वागत योग्य है।

photo: Gulzar Hussain
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