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कब दूर होगी भारतीय किसानों की समस्या ?

by Gulzar Hussain, India, 02 April 2013


भारतीय किसानों की समस्या लगातार बढती जा रही है। पिछले कई वर्षों से देश के कई इलाकों में किसान अपनी गरीबी और घाटे से आहत होकर जान देते रहे हैं। वहीं दूसरी ओर राजनीतिक हलचलों और आश्वासनों के बावजूद किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला नहीं थम रहा है। पिछले कुछ वर्षों में  भारत के महाराष्ट्र राज्य में किसानों की आत्महत्या की घटनाएं विश्व स्तर पर चर्चा का विषय बनी रही है । अब सवाल यह उठता है कि राजनीतिक हलचलों से हमेशा लबालब रहने वाली महाराष्ट्र की धरती को आखिर किसान अपनी खून से क्यों सींचने पर मजबूर हो गए हैं ? क्या कारण है कि प्रांतवाद, सांप्रदायिकता और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर देश भर की राजनीति को प्रभावित करनेवाली महाराष्ट्र की सियासी पार्टियां किसानों की समस्याएं दूर करने में विफल रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र में कई किसानों ने आत्महत्याएं की हैं , लेकिन इसकी प्रतिध्वनि कहीं सुनाई नहीं पड़ी। ऐसा नहीं है कि किसानों की आत्महत्याओं को लेकर राजनीतिक पार्टियों ने शोर नहीं मचाया है,लेकिन इस शोर ने किसानों की पीड़ा को कम करने की बजाय अधिक बढ़ा दिया है। दरअसल महाराष्ट्र में प्रमुख विपक्षी पार्टियों में प्रांतवाद या सांप्रदायिकता के मुद्दे को भुनाने की होड़ सी चली हुई है। यह होड़ महाराष्ट्र की राजनीति की पुरानी परंपरा बन गई है और इसीलिए कई गंभीर समस्याएं राजनीतिक लापरवाही की भेंट चढ़ जाती हैं। अब इसे महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि यहां की दो बड़ी क्षेत्रीय पार्टियां प्रभावशाली राजनीति में शीर्ष पर रहने के बावजूद किसानों की पीड़ा को दूर नहीं कर सकी हैं। इतना ही नहीं किसानों की बढ़ती समस्याओं को लेकर यहां की प्रमुख विपक्षी पार्टियां राज्य सरकार पर भरपूर दबाव बनाने में हमेशा असफल रहती हैं। चुनावों के समय तो किसानों की खुशहाली के लिए भरपूर वादे किए जाते हैं,लेकिन चुनाव के बाद सबकुछ ठंडा पड़ जाता है। ऐसा इसलिए भी हो रहा है कि किसानों के बिगड़े हालात को राजनीतिक वोट बैंक बनाना सियासी पार्टियों के लिए  संभव नहीं रहा है, इसलिए किसानों के इतने बड़े पैमाने पर जान देने के बावजूद न तो कोई पार्टी इसे प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बनाती है और न ही मीडिया इसे तरजीह देती है।

Indian farmer, Ahmedabad. photo: Su-Kyung Han

आपने देखा होगा कि महाराष्ट्र में भाषावाद, प्रांतवाद या सांप्रदायिकता के मुद्दे पर कई प्रमुख राजनीतिक पार्टियां जितने जोश के साथ सड़कों पर उतरकर शक्ति प्रदर्शन करती हैं, उतनी तत्परता वह किसानों के लिए नहीं दिखाती। दरअसल किसानों की समस्या का राजनीतिक ध्रुवीकरण करना असंभव है, इसलिए  राजनीतिक पार्टियां अपनी-अपनी नीतियों के साथ बिना कोई फेरबदल किए ही खुश हैं। महाराष्ट्र की सत्ता पर काबिज कांग्रेस-राकांपा के पास जो किसानों के लिए नीतियां हैं ,उससे कुछ खास अलग यहां की विपक्षी पार्टियों की रणनीति नहीं रही है।

यही बात केंद्र की संप्रग सरकार और देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों के लिए भी लागू होती है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि किसानों से संबंधित जो योजनाएं या उपाय कांग्रेस या उसकी सहयोगी पार्टियों के पास  है ठीक वही भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों के भी हथियार रहे हैं।

स्पष्ट रूप से कहा जाए तो विदेशी पैटर्न पर बनी योजनाओं का लाभ गरीब और मध्यम दर्जे के किसानों को मिल नहीं पाता, जबकि रसूखदार भूमिपति इससे खूब फायदा उठाते रहे हैं। सबसे गंभीर तथ्य तो भारतीय कृषि व्यवस्था पर विदेशी वित्तीय नियमों का प्रभाव रहा है। बीज और खाद आपूर्ति के अलावा कृषि कार्य के अन्य पायदानों पर विदेशी कंपनियों के हस्तक्षेप को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। सवाल यह उठता है कि क्या पूंजीवाद की चकाचौंध में भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण का पिशाच किसानों की जान तो नहीं ले रहा है। 'डंकल प्रस्ताव' पर मुहर लगते ही भारत के कृषि उत्पादों के लिए बीज का 'पेटेंट' विदेशियों ने किया। इस 'पेटेंट' के कारण विदेशी कंपनियों से भारतीय किसानों को काफी ऊंचे दाम पर बीज खरीदने पर मजबूर होना पड़ता है। साम्राज्यवादी देशों को कृषि उत्पाद सस्ते में बेचकर किसान उन्हीं विदेशी कंपनियों की एजेंसियों से महंगे बीज लेता है और इस चक्रव्यूह में उलझ जाता है। विदेशी बीजों के साथ-साथ विदेशी कंपनियां रासायनिक उर्वरकों की मात्रा भी तय रखती हैं, जिससे किसानों को अधिक खर्च करने के लिए कर्ज लेने की नौबत तक आ जाती है। विदेशी रासायनिक उर्वरकों से खेतों की उर्वरा शक्ति भी प्रभावित होती ही है, लेकिन किसान इस झांसे में आ ही जाते हैं और अपना सबकुछ गंवा देते हैं। विदेशी पूंजीवाद के षड्यंत्रों ने किसानों के सारे श्रम- हथियार छीनकर उन्हें निहत्था बना दिया है। 'आईएमएफ' और 'विश्व बैंक' के इशारे पर किसानों के कल्याण करने के कसीदे पढ़े जाते हैं। किसानों को भरपूर प्रलोभन देने के बाद  साम्राज्यवादी देशों की तिजोरियां भरी जाती हैं। सरकार के लिए विदेशी या देशी पूंजी ही कृषि संबंधी नीतियों का निर्धारक होती हैं, इसलिए सरकार इससे हटकर स्वतंत्र फैसले करने का हौसला ही नहीं जुटा पाती।

A farmer in Ahmedabad. photo: Su-Kyung Han

गौरतलब है कि पूंजीवाद ने शुरुआती दौर से ही किसानों पर गिद्ध दृष्टि जमाए रखी है। पूंजीवादी नीतियों ने किसानों के लिए सारे रास्ते बंद कर दिए हैं, जिससे वे कर्ज लेने पर विवश हैं। सच्चाई तो यह है कि किसानों की आत्महत्या की घटनाएं भीषण कृषि संकट की दस्तक हैं और इसका हल वर्तमान व्यवस्था से नहीं हो सकता है। राजग और संप्रग सरकारों के दौर में घाटा और कर्ज के बोझ से दबे किसानों ने लगातार आत्महत्याएं की हैं । यह सिलसिला लगातार बढ़ता ही जा रहा है। इन सरकारों के कल्याणकारी 'पैकेज' भी आत्महत्याओं का दौर रोकने में नाकामयाब रही हैं। इन दिनों महाराष्ट्र भीषण सूखे की चपेट में हैं और इससे निश्चित रूप से किसानों के लिए समस्याएं बढ़ने वाली है । अगले वर्ष लोकसभा चुनाव होने हैं , इसलिए राजनीतिक पार्टियों में मुद्दे हड़पने का सिलसिला भी चल पड़ा है ।  लेकिन अब भारत की राजनीतिक पार्टियों को यह समझ लेना चाहिए कि अगर किसानों की समस्याओं को शीघ्र दूर नहीं किया गया तो , नए आंदोलन की शुरुआत हो सकती है

 

* Related Article: An endless melancholic story of Indian farmers >>

image: User:Amog

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