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गांवों - देहातों से निराश युवा तलाशते बड़े शहरों में मंजिल

  

- गुलज़ार हुसैन   (Gulzar Hussain), Mumbai(India), April 16, 2013

गांवों  -देहातों में बढ़ती बेरोज़गारी से परेशान होकर लोग शहरों -महानगरों में काम करने आते हैं ,लेकिन शहरों में भी उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है । रोज़ी -रोटी की मजबूरी ही गांवों से गरीब किसानों,कारीगरों और मजदूरों को बड़े शहरों में ले आती है लेकिन इस पर राजनीतिक दुनिया में रहने वालों का ध्यान नहीं जाता । गाँवों में रोजगार ,शिक्षा और स्वास्थ सेवाओं की सुविधा स्तरीय नहीं होती और लोगों को मजबूरी में शहर जाना होता है । गाँवों से शहरों में पलायन की इस गंभीर समस्या को कई राजनीतिक पार्टियां अपने -अपने अंदाज में भुनाती रहीं हैं। कई महानगरों में प्रांतवाद या भाषावाद के नाम पर राजनीतिक पार्टियां रोटी सेंकने लगती हैं ,तो दूसरी तरफ गांव की जनता को गरीब बनाए रखने की जिम्मेदार पार्टियां अपना वोट बैंक मजबूत करने के लिए जोर-शोर से बयान देने लगती हैं। इस तरह गांव की गरीब जनता के दोनों गाल पर थप्पड़ पड़ते हैं ,लेकिन इसको लेकर राजनीतिक दुनिया में एक हंसी-ठिठोली जैसा वातावरण बना  रहता है। एक तरफ नेता जोकर जैसे अभिनय करके गांव के गरीब लोगों को कोसता है ,तो दूसरी तरफ झूठे साहस का परिचय देने के लिए गांववाले के समर्थन में कोई नेता खड़ा हो जाता है। इससे केवल राजनीतिक दुनिया में ही घमासान मचता है ,लेकिन इससे गरीब ग्रामीणों को कोई फायदा नहीं होता। दोनों तरफ के राजनीतिक  हमले में वे बुरी तरह पिस जाते हैं। वे यदि गांव लौट जाएं,तो उनके बच्चे और बूढ़े माता-पिता सूखी रोटी के लिए तरस जाएं और यदि बड़े शहर में रहें तो राजनीतिक घृणा का शिकार बनें। गरीब जनता के लिए इधर कुआं,तो इधर खाई जैसी स्थिति पैदा हो जाती है। मुंबई में पिछले कुछ वर्षों के दौरान प्रांतवाद और भाषावाद के नाम पर इतना जहर फैलाया गया कि बहुत सारे लोगों को अपना जमा- जमाया कारोबार छोड़कर लौटना पड़ा है। मुंबई के अलावा अन्य महानगरों और शहरों में भी कई बार प्रांतवाद और भाषवाद के नाम पर लोगों को परेशान करने की घटनाएं सामने आई हैं ।

   
Poor people's life in big cities. photos: Su-Kyung Han

प्रांतवाद की राजनीति निंदनीय है, लेकिन नई पीढ़ी को गरीबी के उन कारणों की पड़ताल भी करनी है, जिसके कारण लगातार शहरों में पलायन बढ़ा है। बिहार और उत्तर प्रदेश को ही यदि हम इस मुद्दे के केंद्र में रखकर बातें करें तो ,स्थिति बहुत साफ हो जाएगी। इन दोनों बीमारू प्रदेशों के गांवों -कस्बों में रोजगार की संभावनाएं बहुत कम होने की वजह से गरीबों के लिए दिल्ली,कोलकाता या मुंबई जैसे बड़े शहरों में जाकर काम ढूंढ़ना एक तरह से जरूरी हो जाता है। लेकिन समस्या यह है कि इन इलाकों से पलायन करने वालों में सबसे अधिक संख्या गरीबों की होती है। किसी राज्य से यदि गरीबों की इतनी बड़ी संख्या केवल मजदूरी जैसे काम के लिए महानगरों की ओर रुख करें तो यह समझ लेना चाहिए कि राज्य की स्थिति बहुत दयनीय है।

photo: Su-Kyung Han

 

 

इतना तो स्पष्ट है कि बिहार,उत्तर प्रदेश,उड़ीसा और अन्य राज्यों के ग्रामीण इलाकों में गरीबी रेखा से नीचे गुजर-बसर करने वाले परिवारों के लिए जीवन निर्वाह करना बड़ा कठिन है और इसीलिए गांवों से शहरों के लिए पलायन की स्थिति पैदा हो रही है। ऐसे में सवाल यह उठ खड़ा होता है कि गरीब जनता का पलायन रोकने के लिए राज्य सरकारें क्या कदम उठा रही हैं। कई बार राज्य सरकारों की तरफ से पलायन जैसी समस्या को बड़े हल्के में लिया जाता रहा है और इस तरह से सच्चाई पर पर्दा भी डाला जाता रहा है। सबसे पहले हमें यह देखना चाहिए कि गांवों में गरीब जनता की शिक्षा,स्वास्थ्य और रोजगार के लिए कौन-कौन सी योजनाएं चल रही हैं और ये योजनाएं कितनी सफल रही हैं। कल्याणकारी योजनाओं का शुरू होना और सफल होना ,दो अलग-अलग तथ्य हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों में निश्चित रूप से गरीबों के लिए स्वास्थ्य,शिक्षा और रोजगार से संबंधित कई योजनाएं शुरू हैं, लेकिन इन योजनाओं का कितना लाभ गरीब जनता उठा पा रही है, इस पर ध्यान भी  दिया जाना चहिये । यदि राज्य सरकारें महिलाओं और बच्चों के स्वास्थ्य के प्रति वाकई बहुत चिंतित होती ,तो कुपोषण के  मामले इतने गंभीर नहीं होते। उत्तर प्रदेश के सबसे अधिक इलाके कुपोषण की चपेट में हैं। बिहार का हाल भी इस मामले में बुरा है। बिहार के गांवों -कस्बों में कुपोषण और बेरोजगारी खूब है,लेकिन यहां विकास के ढोल पीटे जा रहे हैं।

भारत को आज़ादी मिलने के बाद गांवों के विकास के लिए तरह-तरह की योजनाएं बनाईं गईं,लेकिन गरीबों की स्थिति इससे नहीं सुधरी। पलायन के कारणों पर गौर करके हम जान सकते हैं कि किस तरह कल्याणकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार करके गरीबों के मुंह से निवाले छीन लिए गए हैं। ग्रामीण इलाकों से कई बार रोजगार योजनाओं,गृह निर्माण योजनाओं और स्वास्थ्य संबंधी योजनाओं में घोटाले होने के मामले प्रकाश में आते रहे हैं। बिहार के कई देहातों और गांवों में गरीबों के रोजगार से संबंधित कार्ड तो बांट दिए गए हैं, लेकिन उनकी बेरोजगारी थम नहीं रही हैं। यहां भूमि सुधार संबंधी सर्वेक्षण के कार्य आगे बढ़ने के बारे में भी कोई जानकारी नहीं है, क्योंकि भूमि सुधार के बिना गरीब किसान खेतीहर मजदूर बन कर रह गया है। अब सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है कि आखिर गाँवों से शहरों में बड़ी संख्या में पलायन रोकने के लिए क्या किया जा सकता है ? जबतक छोटे शहरों ,गाँवों में रोजगार दिलाने के प्रयास नहीं किए जायेंगे ,तबतक लोगों को शहरों में जाना कैसे कम होगा ? गाँवों में शिक्षा ,स्वास्थ और रोजगार की सम्भावना  सरकार की प्राथमिकता जब तक नहीं होगी तबतक कोई आशा की किरण नहीं दिखाई देती।

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Migration of Villagers:

Unemployment and poverty in village and small towns are the main cause for migration to big metro cities. Lowermost class and downtrodden people are searching for better life in big cities .

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